Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
व्योम्नोऽम्बुवाहादिविजृम्भयेव तरङ्गभंग्येव महाजलस्य ।
न युज्यते नापि च नश्यतीह नाशोदयौ निर्मननस्य किंचित् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जो समस्त कल्पनाओं से परे ह वही असली तत्व है, असली वस्तु की तन्मयता बन जाने पर
सारे जगत् का व्यवहार करें. तो भी उससे ज्ञानी के लिए किसी इष्ट वस्तु की क्षति या अनिष्टवस्तु
की प्राप्ति नहीं होती, यह कहते है/
हे राघव, जैसे आकाश में मेघ या कुहरे आदि का ढेर हो जाय अथवा जल में अनेक तरह
के तरंगों का आविर्भाव हो जाय, तो भी उनसे आकाश या जल में किसी इष्ट की क्षति या
अनिष्ट की प्राप्ति नहीं होती, ठीक इसी तरह सम्पूर्ण संकल्पों से निर्मुक्त हुए ज्ञानी पुरुष को
सभी तरह के व्यवहारों से, न तो किसी इष्ट की क्षति होती है और न किसी अनिष्ट की प्राप्ति
ही होती है