Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यासौ प्रसरति व्यर्थं चेत्याभावान्न सा सती ।
असत्कथं प्रसरति वन्ध्यापुत्रः क्व नृत्यति ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्पन्न होते हुए भी सारम खेद का कारण नहीं हैं, यह जो कहा गया है, उसका उपपादन
करते हैं ।
भद्र, जो यह चिति शक्ति है, वह तो स्वाभवतः ही सत्यरूप है, अतः वह विषयों की ओर जो
झुकती है, वह व्यर्थ ही है, क्योकि विषयों की सत्यरूपता तो है ही नहीं । ऐसी स्थिति मेँ असत्
विषयों की ओर वह झुकती है, यह कैसे हो सकता है ? क्या करीं वन्ध्या का पुत्र नृत्य करता है ?
निष्कर्ष यह निकला कि विषयों की तीनों काल में सत्ता न होने के कारण अज्ञान से ही चिति की
विषयों की ओर प्रवृत्ति है, वह जब ज्ञान से बाधित हो जाती है, तब विषय खेद के कारण हो ही नहीं
सकते