Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
जीवितं भुवनं भाति ततोऽहमिति नश्यति ।
तत्त्वमेकेन तज्ज्ञार्कसेवनात्स निषेव्यताम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
वह विचार युरुणी की सेका करने से सफ़ल हो जाता हैं, यह कहते हैं /
श्रीरामजी, जो तत्त्वज्ञरूपी सूर्य है उसका सेवन (संग) करने से यह सारा ही जगत् ज्ञान से
प्रकाशमान हो जाता है, सब पदार्थो का स्वरूप ढँक देनेवाला अहम्भावरूप अन्धकार नष्ट हो
जाता है, वस्तु का असली स्वरूप एक ही क्षण में भासने लग जाता है, अतः तत्तवज्ञरूपी सूर्य की
आप सेवा (संगति) करें