Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 26
42 verse-groups
- Verse 1लाखों बातें आती-रहती हैं
- Verse 2इन सारे कृतान्तो में एकमात्र भावना ही मूल हैं, यह कहते है/ ये जितने संसार के पदार्थ हैं,…
- Verse 3भावना में मूल कारण रागादि दोषें से द्ृषित, पक्की कासनाओ से भरा विवेक शून्य वित्त हैं, यह…
- Verse 4अहो, महान् आश्चर्य है कि वासना के बल से पराधीन होकर ये अज्ञानी भूत सब चित्रविचित्र सुख-द…
- Verse 5अहो, यह वासना अतिविषम है,जिसके वश से मनुष्य मिथ्याभूत द्रष्टा आदि त्रिपुटीरूप अर्थो से अप…
- Verse 6यही कारण है कि संस्रार- भ्रम को तैर गये तत्ववेत्ता पुरु छुखी रहते हैं; यों उनकी प्रशसा कर…
- Verse 7अविवेकी की निन्दा करते हैं / अज्ञानी (मूर्ख) और बालक में क्या अन्तर है ? अर्थात् कुछ भी…
- Verse 8भद्र, कहो मछली और मूर्ख (अज्ञानी) में क्या अन्तर है ? ये दोनों मरणपर्यन्त पकड़े हुए अभिला…
- Verse 9शरीर, नारी, धन, आदि जितने ये पदार्थ हैं, वे सब शुष्क बालू से बनाये गये कसोरे के सदृश जल्द…
- Verse 10अब श्रोता के चित्त को लक्ष्य कर कहते हैं हे चित्त, ब्रह्मा से लेकर गुल्म (एक प्रकार का पौ…
- Verse 11केवल विवेकमात्र से संसार की गन्ध ऐसे निकल नहीं सकती जैसे केवल अपने पैर रखने की जगह पर दृष…
- Verse 12यदि तुम्हारा चित्त विवेक और अवधान से युक्त नहीं है, तो उसे कामरूप पिशाच अपने वश में कर ले…
- Verse 13अहकरुक्त जयत् केवल विवेक ओर अप्रमाद से शून्य ज्ञान का विस्तारमात्र है, दसय कुछ नहीं; यह…
- Verse 14हे कामादि शत्रुओं के नाशक, जैसे आँख का आवरण सभी रुप के प्रकाश की शान्ति है, वैसे ही बहिर्…
- Verse 15भद्र, जैसे पवन शीघ्र स्पन्दन का विस्तार करता है, वैसे ही विशुद्ध संवित् अविवेकजनित कुछ स…
- Verse 16यह जगत असल में असत्य है, परन्तु सत्य की नाई प्रतीत होता है, वास्तव में ब्रह्मचिति अन्यका…
- Verse 17जो अलग हो प्राप्त नहीं होता, उसकी अलग खत्ता नहीं रहती, यह सोने आदि में नियम बताते हैं। जै…
- Verse 18जैसे जल में प्रतिबिम्बित पर्वत या पर्वततुल्य तरंग जलरूप ही है, वैसे ही आत्मा में प्रतीत य…
- Verse 19इस प्रकार जयत् के स्वरूप को जान रहे ज्ञानी को सांसारिक सन्ताय की प्राप्ति कभी नहीं होती,…
- Verse 20उसमे दूसरे किसी अन्य प्रकाश की प्रसक्ति भी नहीं है, यह कहते हैं / जब यह जगत् अत्यन्त शान…
- Verse 21वही सब पदार्थों का किसी काल में बाधित न होनेवाला स्वरुप है, यह कहते हैं । ब्रह्मशब्द से ज…
- Verse 22तब कोन स्वरूप बाधित होता है इस शंका पर कहते हैं। जो ये नाम-रूपात्मक पदार्थ है, उनमें बाध…
- Verse 23अस्नली बात यह है कि वह सब रूप केवल मन की कल्पना है, अतः मनके शान्त हो जानेपर वह स्वयं अपन…
- Verse 24भद्र, आकाश के सदृश निर्मल आत्मा के अन्दर मन को विलीन कर स्थित हुए योगी को नाम और रूप की प…
- Verse 25जग्रत् केवल मन का ही संकल्प है, यह किस तरह जाना जा सकता ह 2 भद्र, यह जो हिरण्यगर्भ का मन…
- Verse 26मनोराज्य के सदृश मन जिस किसीका निर्माण करता है, वहाँ सर्वत्र उन-उन वस्तुओं की प्रतीति बनक…
- Verse 27यों छुख-दुःख या उनके साधनभूत पार्थिव आदि विषय कल्पना का विनाश हो जानेपर शून्यरुप या आत्मर…
- Verse 28स्वप्नपर्वत की नाई फार्थिव विष्य भी पार्थिवरुप नहीं है, यानी भिथ्या हैं यों भावना करनी चा…
- Verse 29ऐसी स्थिति में जो निष्कर्ष निकला, उसे बतलाते हैं / अहन्ता की लकीर जब ब्रह्मसत्ता में आ जा…
- Verse 30जैसे सुवर्णनिर्मित कटकशब्दार्थ यानी कड़ा तुम्हे सुवर्णं से पृथक् भासता है, पर वह सत्य नह…
- Verse 31कतरिप आत्मा वास्तव में चारों ओर से जब परिपूर्णभाव से लक्षित हो जाता है, तब शान्त ही रहता…
- Verse 32जैसे किसी यन्त्र से बनाई गयी प्रतिमा वासनाशून्य होने के कारण स्पन्दनशून्य है, यानी स्पन्द…
- Verse 33शरीर की चहल- पहल दशा में भी आत्मा में चहल-पहल नहीं होती, उस बात की संभावना में दूसरा दष्ट…
- Verse 34ज्ञानी का निरन्तर चल रहा जो स्वस्वरूप ज्ञान है, वही देह आदि का जान है, यह क्यों न माना जा…
- Verse 35उक्त स्वस्वरुपानुसन्धान में ष्टा, व्रश्य आदि तिपुटी रहती ही नहीं; इसलिए भी उसको शरीर का प…
- Verse 36सर्वान्वित अपेक्षा यानी सभी विषयों की अभिलाषा ही दृढ बन्धन है ओर सभी तरह की इच्छाओं का पर…
- Verse 37किससे, किसकी इच्छा हो सकती है ?
- Verse 38अब उयसहार करते हैं / ज्ञानी पुरुष केवल अपने स्वरूप में ही स्थिति रखता है, इस स्थिति में उ…
- Verse 39मुख्य अधिकारी होने के कारण भिर्फ़ एक बार उपयुक्त विषयों के श्रवण से ही मकिकी मोहनिवृत्ति…
- Verse 40प्रारब्धवश से जो कुछ भी समय-समय पर कर्तव्य आ जाता था, उसे वह वासना छोड़कर करता हुआ सौ वर्…
- Verse 41आज भी उस पर्वत पर पाषाण के सदृश निश्चल होकर वह स्थित है । उसके चक्षु आदि समस्त करण शान्त…
- Verse 42हे श्रीरामभद्र, आप इस मंकि ब्राह्मण द्वारा स्वीकृत उपाय का अवलम्बन कर ज्ञान में उन्नतिशील…