Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अव्यवच्छिन्ननिर्भागसंविन्मात्रं जगत्त्रयम् ।
विद्धि शान्तं तथा व्योम यथा वारिणि पर्वतम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल में प्रतिबिम्बित पर्वत या पर्वततुल्य तरंग जलरूप ही है,
वैसे ही आत्मा में प्रतीत ये तीनों जगत् शान्त, आकाशरूप तथा सभी तरह के भेदों से शून्य
संवित्स्वरूप (आत्मस्वरूप) ही हैं