Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
आकाशकल्पे स्वे भावे तिष्ठतोऽङ्गानिवेदनम् ।
भवत्यभ्यासदार्ढ्येन विना स्वप्नविकारवत् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, आकाश के सदृश निर्मल आत्मा के अन्दर मन को विलीन
कर स्थित हुए योगी को नाम और रूप की प्रतीति ही नहीं होती, क्योकि नामरूपकी प्रतीति तो अपने
स्वरूप में स्थिति के लिए अभ्यास जब दृढ़ नहीं रहता, तब स्वप्न के सदुश मन में उत्पन्न होती है