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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

यथा मञ्चकसंस्थस्य स्पन्दन्ते नैव वा शिशोः । अङ्गानि स्वानुसंधानं विनैवंविदितात्मनः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

शरीर की चहल- पहल दशा में भी आत्मा में चहल-पहल नहीं होती, उस बात की संभावना में दूसरा दष्टान्त देते हैं । जैसे झूले में सोये हुए बालक के अंग चहल-पहल करते ही नहीं, वैसे ही आत्मतत्त्वदर्शी विद्वान्‌ में अपने स्वरूपानुभव के सिवा चहल-पहल कोई है ही नहीं