Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
अहं सुखीति सुखिता अहं दुःखीति दुःखिता ।
सर्व एव स्वरूपस्था व्योमात्मानोऽपि पार्थिवाः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यों छुख-दुःख या उनके साधनभूत पार्थिव आदि विषय कल्पना का विनाश हो जानेपर
शून्यरुप या आत्मरूप हो जाते हैं; यह कहते हैं ।
भें सुखी हूँ” इस तरह भासमान सुख, मैं दुःखी हूँ” इस तरह भासमान दुःख या उनके
साधनभूत पार्थिव आदि विषय सब मनकी कल्पना के शान्त हो जाने पर आत्मरूप हो जाते हैं या
शून्यरूप बन जाते हैं