Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
यथेक्षणप्रसरणं रूपालोकनमात्रकम् ।
संवित्प्रसृतिमात्रात्म तथा साहंजगत्स्थितम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अहकरुक्त जयत् केवल विवेक ओर अप्रमाद से शून्य ज्ञान का विस्तारमात्र है, दसय कुछ
नहीं; यह कहते है/
जैसे चक्षु का प्रसरणरूप व्यापार केवल रूपका अवलोकनमात्र ही है, इससे भिन्न दूसरा कुछ
नहीं है, वैसे ही अहंकारयुक्त जगत अविवेक और प्रमादयुक्त संवित का प्रसरणरूप व्यापारमात्र ही
है, दूसरा कुछ नहीं