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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

अद्रष्टुरपदृश्यस्यादृग्रूपस्यापरूपिणः । कुतः किलानुसंधानमनपेक्षस्य पश्यतः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त स्वस्वरुपानुसन्धान में ष्टा, व्रश्य आदि तिपुटी रहती ही नहीं; इसलिए भी उसको शरीर का परिज्ञान नहीं होता, यह कहते हैं। समस्त अभिलाषाओं से मुक्त ज्ञानी पुरुष को, जो द्रष्टा, दृश्य और ज्ञानरूप त्रिपुटीरहित निराकार वस्तु को देख रहा है, शरीर का अनुसन्धान कैसे हो सकता है ?