Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
सर्व एव त्विमे भावाः परस्परमसङ्गिनः ।
अटव्यामुपलानीव भावनैतेषु शृङ्खला ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इन सारे कृतान्तो में एकमात्र भावना ही मूल हैं, यह कहते है/
ये जितने संसार के पदार्थ हैं, वे सब एक दूसरे से सम्बन्ध कुछ नहीं रखते, जैसे कि जंगल
में बिखरे हुए पत्थर के टुकड़े । परन्तु उन सबको मिलानेवाली (गुंथने में हेतु) जंजीर के सदृश
भावना ही है