Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
निरुपादानसंभारमभित्तावेव चेतति ।
ब्राह्मं कर्तृ जगच्चित्रं न कश्चिद्वा न किंचन ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जग्रत् केवल मन का ही संकल्प है, यह किस तरह जाना जा सकता ह 2
भद्र, यह जो हिरण्यगर्भ का मन है, वही जगद्रूपी चित्र का निर्माण करता है, इसके पास
न रंग है, न चित्रनिर्माण की कूँची है और न तो कोई चित्र का आधार ही है । इतना होने पर
भी उस चित्र को अपने-आप देखने लग जाता है। क्या कहीं किसीने स्वप्न में मन के सिवा
किसी दूसरे को कर्ता और कार्य देखा है ?