Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 211
33 verse-groups
- Verses 1–2दो सौ नौवाँ सर्गं समाप्त दो सौ दसवाँ सर्ग राजा प्रज्ञप्ति के शेष प्रश्नों के समाधान का नि…
- Verses 3–5क्यो आकाशतल में प्राप्त नहीं हुए ? इस पर कहते है । दूसरे के संकल्पनगर में दूसरा प्रविष्ट…
- Verse 6इसी चन्द्रमा में सबके सव ध्यानकर्ता क्यों प्रविष्ट नहीं हुए, क्योंकि ऐसा करने मे लाघव है…
- Verse 7यदि कोई प्रश्न करे कि अन्य प्रकार से ध्यान करने पर अन्य प्रकार का फल क्यो नहीं होता 2 तो…
- Verse 8जैसे सकल ध्यान कर्ताओं का अपने अपने संकल्पानुसार चन्द्रत्व पृथक् पृथक् भासता हे
- Verse 9"साध्व्यसाध्वी गृहे भर्तुः संस्थिता तपसा परा। इस प्रश्नांश में भी यही समाधान है, ऐसा कहते…
- Verse 10धर से बाहर निकले बिना जीव सप्तद्वीप का पति कैसे हुआ ? इस प्रश्न का भी इससे समाधान हो चुका…
- Verses 11–12जब यह हम लोगों का दृष्टिगोचर जगत् भी सारा का सारा जन्मः सर्वज्ञ ब्रह्म की कल्पनामात्र, श…
- Verse 13दानधमदितपसामौध्वदिहिककर्मणाम् । इहस्थानाममू्तनिं मूर्त परेत्याऽस्ति किं फलम् ॥ इस प्रश्…
- Verse 14हे राजन्, मन और ज्ञानेन्द्रियों से वेदना तथा अवेदनाकार भ्रान्ति होती है, उस भ्रान्ति की…
- Verses 15–16इस लोक में अनुष्ठित (किये गये) दान से परलोक मेँ चित्प्रतिभासस्वरूप तत्-तत् फल प्राप्त ह…
- Verse 17सब प्रश्नो का स्वमुख से अथवा अर्थतः समाधान कर जगत् का ब्रह्म ही तत्त्व है, यो उपसंहार कर…
- Verse 18देह मे ही चित् की अभिव्यक्ति दिखाई देती है, अनभिव्यक्त चित् में भ्रान्ति आदि नहीं दिखाई…
- Verses 19–20जड़ शरीर चित् का अभिव्यंजक नहीं है, यह तत्त्वज्ञानी का पक्ष है, क्योकि उसकी दृष्टि में ज…
- Verse 21स्वप्नदेह के सदुश यह शरीर ब्रह्म ही है उससे भिन्न नहीं है । शंका - स्वप्न में भी यह न्याय…
- Verse 22स्वप्न का मुझे समझाने में कैसे उपयोग है ? इस प्रश्न पर कहते हैं। स्वप्न का अर्थ तुम्हे अन…
- Verse 23स्वप्न में कौन यह देह है, किसके ये स्वाप्न पदार्थ हैं, अथवा कहाँ स्वप्न बुद्धि है ? ज्ञान…
- Verse 24ब्रह्मपदवी में न जाग्रत् है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति हे ओर न अन्य कुछ है किंतु मन, वाणी…
- Verse 25जो यह विश्व आज इस प्रकार भासिता-सा दृष्टिगोचर होता है वह नहीं भासता है । सच्चिदानन्दरूप स…
- Verse 26जैसे संवित् की एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में प्राप्ति होने पर मध्य में (दो प्रदेशों के अ…
- Verse 27अज्ञानी की दृष्टि से अन्यत्र यानी ज्ञानी की दृष्टि में चिन्मय स्वप्न, द्वैत, अद्वैत, शुभ,…
- Verse 28शून्य, पदार्थो की उपलब्धि, भान (सृष्टि), अभान (प्रलय), द्वित, अद्वेत, असत् ओर सत् सव कु…
- Verse 29पूर्ण परम ब्रह्म परमात्मा से पूर्ण जगत् का आविर्भाव होता हे । पूर्ण ही यह स्थित है न तो…
- Verses 30–31चूँकि यह जगत् चित् का उन्मेषमात्र (स्फुरणमात्र) है, इसलिए निराकार चिदाकाशमात्र ही हे ।…
- Verse 32चिदाकाश के संकल्पनगराकार यथास्थित विश्व (सारा जगत्) तथोक्त निर्विकार निर्दोष निर्मल ब्रह…
- Verses 33–34इस विषय में अन्य युक्ति का संभव न होने से यही युक्ति सुन्दर हे । यहाँ युक्ति तथा स्वानुभव…
- Verse 35जब चरमसाक्षात्कारवृत्तिरूप ज्ञान से सारा का सारा विश्व यथास्थित ही विलीन हो जाता है तब पह…
- Verse 36^त्वयाऽर्थो देहशब्दस्य" से लेकर यहाँ तक मेरे द्वारा प्रतिपादित न्याय से जीवन्मुक्ति सहित…
- Verses 37–38इस केवल अपरिज्ञात आत्मरूप संसारवृक्ष में (संसाररूपी पीपल के पेड में) परिज्ञात चिदाकाश ही…
- Verse 39यदि कोई कहे कि चिदाकाश-परिज्ञातमात्र मोक्ष कैसे है 2 तो इस पर कहते है। परिज्ञान से यथास्थ…
- Verse 40उसकी प्राप्ति होने पर अन्य अर्थ के परित्यागमात्र से एकमात्र तन्निष्ठ होना ही उपाय है उससे…
- Verse 41लौकिक कार्य असत्य है लेकिन मोक्ष सत्य है इन दोनों मे यह अवान्तर भेद भले ही हो किन्तु साधन…
- Verse 42हे महात्मन् इस प्रकार मैंने तुम्हारे महाप्रश्नों का विचार-फल-भूत निर्णयरूप यह समाधान कहा…