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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 33,34

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस विषय में अन्य युक्ति का संभव न होने से यही युक्ति सुन्दर हे । यहाँ युक्ति तथा स्वानुभव के बिना पुरुषार्थ चाहनेवाले श्रोताओं के सम्मुख उपदेश शोभा नहीं देता । हे राजन्‌, लोक,शास्त्र, वेदआदि में जो वस्तु युक्ति, प्रमाण ओर अनुभव से सिद्ध है वह सिद्ध ही है उसका त्याग करना उचित नहीं है | ऐसी परिस्थिति में सद्रूप से वेद आदि में सिद्ध ब्रह्म का सद्रूप से ही स्वीकार करना चाहिये तथा वेदादि में असद्रूप से सिद्ध द्वैत का असत्रूप से स्वीकार करना चाहिये, यह अर्थ हे