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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 39

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि चिदाकाश-परिज्ञातमात्र मोक्ष कैसे है 2 तो इस पर कहते है। परिज्ञान से यथास्थित यह दृश्य पानी में डाले हुए नमक के ढेले की तरह विलीन हो जाता हे । दृश्यरूप से अस्त को प्राप्त हुए ज्ञानी का शिला की तरह मौन यानी वाणी आदि से अगम्य दुकूगमात्रस्वरूप शेष रह जाता है॥३ ८॥ लोक में (जीवन्मुक्त पुरुष में), शास्त्र में और वेद आदि में जो वस्तु सिद्ध है वह सिद्ध ही हे । सैकड़ों विचारों से परिनिष्ठित (निश्चित) है वही वस्तु स्वानुभव से जानी जाती है । अतः वह परम पुरुषार्थरूप से फल देती है