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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

काष्ठवन्मौनमास्थाय रटन्तोऽपि महाधियः । इह व्यवहरन्त्येते बुधा दारुनरा इव ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्नदेह के सदुश यह शरीर ब्रह्म ही है उससे भिन्न नहीं है । शंका - स्वप्न में भी यह न्याय समान है अतः स्वप्न देह भी इस देह के समान ही ब्रह्मरूप ठहरा ऐसी दशा में स्वप्नाभ' यों भेद को सिद्ध सा बनाकर दृष्टान्तोक्ति कैसी ? समाधान : स्वप्न का दृष्टांत तुम्हारे समझने के लिए दिया है वास्तव में स्वप्नदेह भी ब्रह्म ही है