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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

जगदप्रतिघं सर्वं शान्तचिद्व्योम सर्वदा । यथा दृढं संविदितं तथैवाभाति नान्यथा ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे राजन्‌, मन और ज्ञानेन्द्रियों से वेदना तथा अवेदनाकार भ्रान्ति होती है, उस भ्रान्ति की विषय-प्राप्ति के लिये वह चिन्मात्र मन सहित कर्मेन्द्रियं से स्पन्द ओर अस्पन्दरूप होता हे । किन्तु उस भ्रान्ति की निवृत्ति होने पर निर्मल शान्त चिद्रूप आत्मा ही शेष रहता है