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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verses 30–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

इत्थमस्तु यदि वान्यथास्तु वा मैव भूद्भवतु कोऽत्र संभ्रमः । मुञ्च फल्गुनि फले फलग्रहं बुद्धवानसि कृतं परिश्रमैः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

चूँकि यह जगत्‌ चित्‌ का उन्मेषमात्र (स्फुरणमात्र) है, इसलिए निराकार चिदाकाशमात्र ही हे । ऐसी परिस्थिति में जहाँ जहाँ चिन्मात्र है वहाँ-वहाँ जगत्‌ का रहना उचित ही हे । ओर चिदाकाश सर्वत्र है, सर्वव्यापक है । सब जगन्मय यह है इसलिए "जगत्‌" शब्द से कथित होने पर भी यह सब शान्त ब्रह्म ही हे