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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

यच्च जातमिवाभाति व्योम्नि व्योमैव तत्तथा । तत्रैकद्वित्वकलना कीदृशी स्यादरूपिणी ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

देह मे ही चित्‌ की अभिव्यक्ति दिखाई देती है, अनभिव्यक्त चित्‌ में भ्रान्ति आदि नहीं दिखाई देते। सृष्टि के आदि में भ्रान्ति की यदि सिद्धि हो ले तो देह की सिद्धि हो और देहसिद्धि से भ्रान्ति की सिद्धि हो यों अन्योन्याश्रय दोष समझ रहे प्रज्ञप्ति राजा ने प्रश्न किया । राजा ने कहा : भगवन्‌, सृष्टि के आदि में चिन्मात्र (देहशून्य चैतन्य) ओर उसके द्वारा की गई देह कल्पना कैसे भासती है ? देह के बिना चित्‌ की अभिव्यक्ति ही नहीं हो सकती । क्या कहीं दीवार के बिना दीपप्रभा प्रकाशती है ?