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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

यथा संकल्पनगरं शून्यमेव पुरं स्थितम् । साकारमप्यनाकारं ब्रह्मणीदं तथा जगत् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मपदवी में न जाग्रत्‌ है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति हे ओर न अन्य कुछ है किंतु मन, वाणी से अगोचर विराट्‌, विश्व तथा तैजस सबका प्रलय होने पर अवशिष्ट यानी तुरीयरूप (सबके प्रलय का अधिष्ठान तुरीय) ओंकारलक्षणपरमपुरुषार्थ स्वयं प्रकाश चिदाकाश ही इस तरह विश्व के रूप में भासता है