Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 37
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इस केवल अपरिज्ञात आत्मरूप संसारवृक्ष
में (संसाररूपी पीपल के पेड में) परिज्ञात चिदाकाश ही है उससे अणुमात्र भी भिन्न नहीं हे । वह
परिज्ञात चिदाकाशरूप मैं ही क्रमश: त्रिजगत्रूप बन्धन ओर मोक्ष हूँ यह निर्णय हे । यानी अपरिज्ञात
ही त्रिलोकीरूप बन्धन है ओर परिज्ञात चिदाकाश ही मोक्ष हे