Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 211, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 211 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
तद्धि यादृशमेवासीत्तादृगेवावतिष्ठते ।
निर्विकारं यथा स्वप्ने व्योमैवाचलवद्भवेत् ॥ १९ ॥
संकल्पे चित्तमाकारं यथोदेत्यद्रिलीलया ।
न च सोऽद्रिर्न तद्व्योम तथा ब्रह्म जगत्स्थितिः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जड़ शरीर चित् का अभिव्यंजक नहीं है, यह तत्त्वज्ञानी का पक्ष है, क्योकि उसकी दृष्टि में जड़ की
ही प्रसिद्धि नहीं है । ब्रह्म सर्वज्ञ होने से सदा ही अभिव्यक्त वैतन्यवाले देह आदि सबकी कल्पना करता
है, इस अभिप्राय से उत्तर देतेहै।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे महाबुद्धे, तुमने देह शब्द का जो अर्थ जाना है वह तत्त्वज्ञानी के प्रति वैसे
ही असंभव है जैसे कि आकाश में पत्थरों का नाचना असंभव हे । जो ही ब्रह्मशब्द का अर्थ हे वही
देहशब्द का अर्थ है जैसे अम्बु और अम्भस (नीर) शब्दों के अर्थ का भेद नहीं है यानी दोनों शब्दों का
अर्थ एक "जल" ही हे वैसे ही ब्रह्म ओर देह शब्दों के अर्थो में भी भेद नहीं हे