Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 196
एक सौ चौरानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ पचानबेवाँ सर्ग प्रबुद्ध हुए श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दर उक्तियों की प्रशंसा कर गुरु द्वारा किये गये प्रश्नों का श्रीरामचन्द्रजी द्वारा समाधान |
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, बड़े हर्ष की बात है आप प्रबुद्ध हो गये हें । आप…
- Verse 2असत् ही यह जगत् अज्ञान जनित संकल्पवश जो स्फुरित-सा होता है यही बन्धन है ओर असंकल्प की द…
- Verse 3कल्पन और अकल्पनरूप बन्धन और मोक्ष अज्ञात और ज्ञात ब्रह्म के ही रूप हैं यह निष्कर्ष भी फलि…
- Verse 4शिलागर्भ के समान जो स्थिति है वह निर्मल मुक्तता कही जाती है
- Verse 5इस पद में स्थिति ही हम जैसे जीवन्मुक्तो की समाधि और व्युत्थान में तुल्यरूप स्थिति है, ऐसा…
- Verse 6प्रबुद्ध अतएव प्रशान्तस्वरूप ब्रह्मा, विष्णु, महादेव आदि व्यवहार परायण होते हुए भी सदा इस…
- Verse 7शिला के गर्भ के समान विक्षेपशून्य स्थितिवाले हम प्रबुद्ध लोगों का यह निर्दोष पद है । आप भ…
- Verses 8–9इसप्रकार श्रीवस्रिष्ठजी की उक्ति से जीवन्युक्तिपद में प्रतिष्ठित श्रीरामचन्द्रजी जीवन्मुक…
- Verses 10–12अब श्रीवसिष्ठजी महाराज श्रीरामचन्द्रजी को जीवन्मुक्ति-स्थिति का वर्णन करने के लिए वक्ता क…
- Verses 13–14इस जगद्भरान्ति का कारण ही क्या है जिससे कि इसका आविभव हुआ है ? कारण के बिना कहीं कोई कार्…
- Verse 15यदि किये कि निर्विकार ब्रह्म ही विवर्तोपादानकारण होकर माया से जगत् के आकार में स्फुरित ह…
- Verse 16उस निर्विकार शान्त पद में हिरण्यगर्भ नामधारी (८) प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो द्वारा दृढ़ तथा अर…
- Verse 17जैसे आपको स्वप्न में एक क्षण काल में एकवर्षं की प्रतीति होती है वैसे ही उसे भी एक क्षण मे…
- Verses 18–22एकमात्र संकल्पस्वरूप उस हिरण्यगर्भ नामक प्रथम चेतन को देश, काल और कर्म से युक्त सम्पूर्णं…
- Verses 23–25यदि अत्यन्त असत् में मिथ्यात्व धर्मकी भी अप्रसिद्धि का अवलोकन करें तो केवल अधिष्ठानमात्र…
- Verse 26ऐसा होने पर जो फलित हुआ उसे कहते है। इस प्रकार यह समो से भी सम (सर्वथा विषमतारहित) विग्रह…
- Verses 27–28जैसे जल में लहरियो के उतराने ओर डूबने से जल में भिन्नता नहीं आती वैसे ही ब्रह्म मे अन्य ज…
- Verses 29–31परब्रह्म में परब्रह्म का वेष-सा, कार्य का अथवा अवयव-सा यह अपर का (जगत्जीवरूप का) भान होत…
- Verse 32जैसे ब्राह्मण मदिरा के माधुर्य को नहीं जानता वैसे ही प्रबुद्ध पुरुष परमार्थ चमत्कार से अप…
- Verses 33–34इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के श्रीवसिष्ठजी शंका का समाधान करने पर फिर वस्तिष्टजी बीजाकुरन्…
- Verse 35ब्रह्म के अन्दर जगत्सत्ता वैसी (बीज में अंकुर के तुल्य) नहीं हे किन्तु जगत्ता ही उपलब्ध ह…
- Verse 36निर्विकार निराकार से विकारवान् ओर साकार का आविर्भाव होता है यह हमने कहीं लोक में न देखा…
- Verse 37इसी प्रकार निर्विकार ओर निरवयव मेँ साकार ओर सावयव की (स्थूल की) स्थिति भी प्रत्यक्ष आदि स…
- Verse 38पेटी में रत्न की तरह निराकार ब्रह्म मेँ महाकार (विशाल) जगत् स्थित है यह कथन तो उन्मत्त क…
- Verse 39शान्त (सर्व उपरतिरूप) परमब्रह्म साकारजगत् का तादात्म्य से (अभेदसम्बन्ध से) आधार है यह कथ…
- Verse 40ऐसी स्थिति में अपूर्व स्वप्न के समान वद्धमूल आकारो से क्षणिक बोध ही साकार होता है यह उपपत…
- Verse 41क्यो उपपन्न नहीं होती ? इस प्रश्न पर कहते हैँ । क्योकि यह सर्गरूप स्वप्न अपूर्वं (पहले अन…
- Verse 42इसलिए बौद्ध लोगों का जाग्रत् और स्वप्न के भेद का अभाव कथन भी असंगत ही है, ऐसा कहते हैं ।…
- Verse 43वार्वाक के आक्षेप का समाधान करते हैं। जिसका स्थूल शरीर नहीं होता उसका स्वप्न देखने में नह…
- Verse 44इसलिए परिशेष से निर्दोष अपना पक्ष स्थित रहा, यह कहते है । इस कारण जैसे स्वप्न मे चिति पर्…
- Verses 45–46ब्रह्मात्मेकता का ज्ञान होने पर प्रपंच का स्वप्न की नाई ही बोध होने से सत्ता ओर असत्ता से…
- Verse 47अतः अनिर्वचनीय यह जगत् परमात्मा के स्वरूप के प्रबुद्ध होने यानी ज्ञानवान् होने पर कदापि…
- Verse 48भाव यानी आत्मा के अस्तित्व, प्रियत्व आदि धर्म अभावरूप तथा अभाव (जगत् के आदि धर्म) भावरूप…
- Verses 49–53ब्रह्म में ब्रह्म वृद्धि को प्राप्त होता है ओर आकाश में आकाश वद्धि को प्राप्त होता है जगत…
- Verses 54–59मेरा यह वाक्य यथार्थ ही है, क्योकि यह अनुभवमूलक है, यों युक्ति के साथ कहते हैं। भगवन्, ज…
- Verses 60–61दृष्टिभेद से जगत् चार प्रकार का सम्पन्न हुआ, यह कहते हैं। यह जगत् अज्ञानी की दृष्टि में…
- Verse 62हे गुरुवर, मैं आकाश हूँ, आप आकाश हैं, चित् आकाश है, आकाश आकाश ही है । आप चिदाकाशरूपता को…
- Verse 63हे गुरुवर, ब्रह्माकाशभाव से स्थित, आकाशकल्प स्वरूप ज्ञान से सर्वात्मक चिदाकाश सदुश दो चरण…
- Verse 64जो स्वत्मिक है वह गगनतुल्य भी यह कथन विरुद्ध है इस शंकाका निवारण करते हुए कहते है । ब्रह्…
- Verses 65–67सकलशास्त्रीय युक्तियों का अतिक्रमण करनेवाला यानी सकल शासत्रयुक्तियों का अगम्य, सकल पदों स…
- Verse 68चूँकि काष्ठमोनपर्यवसायी होने सा काष्ठमोनरूप सर्वापहन वादविवाद में नहीं हो सकता हे, इसलिए…
- Verse 69प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो का जो अगम्य है निराकार निर्विकार स्वानुभववेद्य वह ब्रह्म वादविवादों…
- Verse 70उक्त विषय का ही साररूप से संक्षेप कर उपसंहार करते है। सकलशास्त्रों के अर्थो से अतीत, अनुभ…