Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 10–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verses 10–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 10-12
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
अब श्रीवसिष्ठजी महाराज श्रीरामचन्द्रजी को जीवन्मुक्ति-स्थिति का वर्णन करने के लिए
वक्ता के सिंहासन पर आरूढ कर मैं आपसे शिष्य की भाँति पूछता हूँ आप अपना संशय दूर
कीजिये, यह कहते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, यदि आप तत्त्वबोध प्राप्त कर चुके हैं तो अपने बोध की
अभिवृद्धि के लिए प्रश्नकर्ता के रूप में पूछ रहे मेरा संशय दूर कीजिये । हे श्रीरामजी, भला बतलाइये तो
सही, इस प्रकार नित्य अनुभूत भी सिरपर सदा सवार हुआ भी (~) अत्यन्त जगमगा रहा यह "जगत्"
नामक आभास कैसे नहीं है ?
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे गुरुवर, यह पहले ही कभी कुछ उत्पन्न ही नहीं हुआ, क्योकि इसका
कोई कारण नहीं है । अतः वन्ध्यापुत्र के तुल्य इस जगत् का अस्तित्व कल्पना के सिवा और कुछ नहीं
है । यदि इसकी सत्ता है तो काल्पनिक सत्ता ही है वास्तविक सत्ता इसकी नहीं हे