Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 18–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verses 18–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 18-22
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
एकमात्र संकल्पस्वरूप उस हिरण्यगर्भ
नामक प्रथम चेतन को देश, काल और कर्म से युक्त सम्पूर्णं भुवन एकमात्र चिदाकाश में ही अपने आप
खूब भासित होता है । तदुपरान्त यह मिथ्या पुरुष (काल्पनिक पुरुष) हिरण्यगर्भ मिथ्या ही सम्पन्न
भुवन में मिथ्या ही भूत, भुवन आदि की सूृष्टिक्रिया करता हुआ विवर्तता को प्राप्त होता है । वही
हिरण्यगर्भ अनन्त पदार्थो के अनर्थरूपी भ्रम की कल्पना कर सुकृत आदि फल का भोग करने के लिए
नीचे से ऊपर जाता हे ओर फिर ऊपर से नीचे जाता है । यदि उसके संकल्प की काकतालीय के समान
जैसी पहले स्थिति थी वैसी ही आज भी स्थिति हुई तो उसी से “वही यह है" एसी प्रत्यभिज्ञा कर उसने
जगत् में भ्रान्ति से सुस्थिर (दृढ) स्थिति ग्रहण की । इस प्रकार भ्रान्ति से उपस्थित यह मिथ्या जगत्
शिलारूपी नायिका वन्ध्यापुत्ररूपी अपने पति के ललाट में आकाश के चूर्णं से तिलक लगाकर शोभा
की अभिवृद्धि करती है इत्यादि वाक्यार्थ के समान केवल विकल्प ही है