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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 37

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार निर्विकार ओर निरवयव मेँ साकार ओर सावयव की (स्थूल की) स्थिति भी प्रत्यक्ष आदि सव प्रमाणो से विरुद्ध है, ऐसा कहते है । निराकार निरवयव ब्रह्म में साकार और सावयव इस दृश्य की स्थिति वैसे ही असंभव है जैसे कि परमाणु के अन्दर अनेक सुमेरु पर्वतो का भासना असंभव है