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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 42

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 42

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसलिए बौद्ध लोगों का जाग्रत्‌ और स्वप्न के भेद का अभाव कथन भी असंगत ही है, ऐसा कहते हैं । जो ही जाग्रत्‌ है वही स्वप्न है इस प्रकार का वौद्धाभिमत जाग्रत्‌ और स्वप्न का अभेद यहाँ उपपन्न नही होता, क्योकि स्वप्न में मरा हुआ श्मशान में ले जाकर जलाया गया पुरुष प्रातःकाल में फिर केसे दिखलाई देता है ? यदि जाग्रत्‌ ओर स्वप्न का अभेद होता तो स्वप्न में मरे हुए जलाये गये पुरुष का फिर दर्शन न होता। इसलिए चित्‌ की साकारत्व, क्षणिकत्व आदि की कल्पना से प्रपंच की स्वप्नतुल्यता सकल प्रमाणो से विरुद्ध सिद्ध होती है अतः कूटस्थ ब्रह्म मे अध्यस्त होने के कारण ही बाध्य होने से प्रपंच की स्वप्न तुल्यता सिद्ध है, यह अभिप्राय हे