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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 8–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

इसप्रकार श्रीवस्रिष्ठजी की उक्ति से जीवन्युक्तिपद में प्रतिष्ठित श्रीरामचन्द्रजी जीवन्मुक्त पुरुषों को जैसा जगत्‌ भासता है उसका वर्णन करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, जैसे मृगतृष्णा में जल भासता है, जैसे जल में तरंग, आवर्त आदि पृथक्‌ से भासते हैं, जैसे सुवर्ण मेँ कटक, कुण्डल आदि भासते हैं ओर जैसे स्वप्न ओर संकल्प का पर्वत भासता है वैसे ही असद्रूप,कभी उत्पन्न न हुआ, उत्पन्न न होने के कारण ही अप्रकाशमान (पृथक्‌ प्रतीत न होनेवाला), आरम्भरहित ओर आकारशून्य ही यह जगत्‌ ब्रह्म में भासता है