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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 32

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जैसे ब्राह्मण मदिरा के माधुर्य को नहीं जानता वैसे ही प्रबुद्ध पुरुष परमार्थ चमत्कार से अपने अन्दर के अनुभव के बिना अन्य के (अपवित्र प्रपंच के) भोग-रस को नहीं जानता हे । अथवा जैसे ब्राह्मण मदिरा के माधुर्य को नहीं जानता वैसे ही अन्य (अज्ञ) पुरुष अपने अन्दर के अनुभव के बिना अन्य के (प्रबुद्ध के) परमार्थचमत्कार को नहीं जानता है यह अर्थ करना चाहिए। इस अर्थ में ˆअन्यस्याऽन्यं न जानाति“ पाठ के स्थान पर अन्यस्याऽन्यो न जानाति“ पाठ मानना पड़ेगा॥ ३ १॥ यह निजात्मा बाह्यदृष्टि से लोटकर, चेत्योन्मुखता का त्यागकर समाधि में चरम साक्षात्कार वृत्ति से अवलोकित होकर शान्त मुक्तात्मा में स्थित होता हे, क्योकि "कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमेक्षदावृत्त क्षुरमृतत्वमिच्छन्‌ ।"अर्थात्‌ मोक्ष की इच्छा कर रहे किसी धीर महात्मा ने विषयोन्मुखता का त्यागकर (अन्तर्मुख-इन्द्रिय होकर) प्रत्यगात्मा का साक्षात्कार किया । ऐसी श्रुति है