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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 60–61

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verses 60–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 60,61

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

दृष्टिभेद से जगत्‌ चार प्रकार का सम्पन्न हुआ, यह कहते हैं। यह जगत्‌ अज्ञानी की दृष्टि में सत्य है, विवेकवान्‌ पुरुषकी दृष्टि में मिथ्या है । इसे ब्रह्मरूप देख रहे पुरुष की दृष्टि में ब्रह्म है तथा पहली, दूसरी, तीसरी भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में आरोहणक्रम से शान्त हुए पुरुष में अन्धकार की तरह क्रम से शान्त होकर अन्त में शून्य ही हो जाता है। स्थावर और जंगम सहित सकल अस्मदादि भावरूप जगत्‌ तत्त्वज्ञानी की दृष्टि में आकाशरूप ही है