Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 23–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 23-25
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
यदि अत्यन्त असत् में मिथ्यात्व धर्मकी भी अप्रसिद्धि का अवलोकन करें तो केवल अधिष्ठानमात्र
होने से यह सत्य ही है, ऐसा कहते है ।
भगवन्, अथवा यह सत्य ही है इसका मिथ्यात्व कोसि हो सकता है यदि व्यावर्तन करने योग्य
(निवर्तनीय) मिथ्यात्व की अप्रसिद्धि से व्यावर्तक सत्यत्व की कल्पना भी उसमें नहीं घट ती ऐसा
विचार करते हैं तो निर्वचन वाणी का प्रसार न होने से यह अवर्णनीय कुछ अजन्मा विस्तृत है यह जगत्
आकाशकोश के सदुश निर्मल, शिलागर्भ के समान ठोस ओर पाषाण के समान मौन शान्त अक्षय
(ब्रह्म) ही है । चिदात्मा के मायिक सर्वाकार संकल्परूप विराट् आतिवाहिक देह में संवेदनरूप जो
आकाश है वही जगत् के रूप में भासता हे