Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 45–46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 45,46
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मात्मेकता का ज्ञान होने पर प्रपंच का स्वप्न की नाई ही बोध होने से सत्ता ओर असत्ता से
निर्ववन करने के अयोग्य तुच्छता ही परिशिष्ट रहती है, ऐसा कहते है ।
यदि यह प्रत्यगात्मा सकल बन्धनो से रहित ब्रह्म ही है ओर यह प्रपंच अज्ञान द्वारा ही स्वप्नवत् कृत
है यह सिद्धान्त है तो इस सिद्धान्त में उस प्रकार के ब्रह्मात्मा के उपलब्ध होने पर इस प्रपंच में अस्तित्व,
नारितित्व आदि धर्मो का अनुभव होता ही नहीं तथा इसमें अनुभविता ओर अनुभव आदि का क्रम भी
उपलब्ध नहीं होता