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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 33,34

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के श्रीवसिष्ठजी शंका का समाधान करने पर फिर वस्तिष्टजी बीजाकुरन्याय से ब्रह्म मे जगत्सत्यता की शंका करते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, दृश्य कारणभूत ब्रह्म में बीज में अंकुर के समान स्थित है । ऐसी परिस्थिति में यहाँ सर्गादि के अस्तित्व की उपपत्ति क्यो नहीं होती है ? श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, यदि अंकुर सत्य हो तो बीज के अन्दर स्थित ही वह बीजपट को तोड़कर बाहर निकलता है यह मानना होगा किन्तु ऐसी बात है नहीं । बीज को फोड़ने पर उसके अन्दर अंकुररूप से स्थित अंकुर दिखाई नहीं देता । बीज के अन्दर जो सूक्ष्म अवयवो का अस्तित्व है वह बीज ही है, अंकुर नहीं हे