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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 188

एस सौ छियासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्तासीवाँ सर्गं सम्पूर्ण पदार्थो का स्वभाव, नियति (कार्यकारणभाव आदि का नियम) तथा जीवत्व की प्राप्ति के हेतुओं की उत्पत्ति ओर ब्रह्मशुद्धता का वर्णन ।

42 verse-groups

  1. Verses 1–2श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, विचित्र असंख्य पदार्थों का कार्यकारण भावादि नियमरूप नियत…
  2. Verse 3आदि सृष्टि में जो जो काकतालीयन्याय से विधाता को जैसा-जैसा प्रतीत हुआ वह वैसा ही अर्थक्रिय…
  3. Verse 4नियत ईश्वर शक्ति का अन्यथाभाव तो हो नहीं सकता, इसलिए नियति में कोई व्यभिचार नहीं हुआ, इस…
  4. Verse 5ज्यो -के-त्यों अपने स्वरूप में स्थित ब्रह्म का, चित्‌ होने के कारण, चिरकाल तक जैसा स्फुरण…
  5. Verse 6अथवा नियत सकल अथक्रिया में समर्थ ब्रह्म ही जयदाकारता धारण करता है, इसलिए भी नियति प्रतिष्…
  6. Verse 7अथवा चकि जाग्रत्‌. स्वप्न ओर सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओ का अज्ञात आत्मा ही स्वभाव है, इसलि…
  7. Verses 8–9जाग्रत्‌. स्वप्न ओर सुषुप्ति तीन अवस्थाओं की चित्स्वभावता का विविध दृष्टान्तो से समर्थन क…
  8. Verse 10अतएव चित्‌ के स्फुरण के अनुसार से ही सव नियमव्यवस्था है। क्षण में भी यह कल्प है' यों चित्…
  9. Verse 11अतएव काल, किया, देश, द्रव्य आदि वस्तुभेद रूप से चित्‌ स्फुरण ही सकल वस्तु का स्वभाव और नि…
  10. Verse 12चिदाकाश में निराकार चित्तता का जो स्वाभाविक स्फुरण हे, वह बाह्यपदार्थदर्शन, आन्तरिक पदार्…
  11. Verse 13जो पदार्थ जिस काल में जैसा चित्‌ से स्फुरित है जिसकी उसी ने वैसी कल्पना कर रक्खी है वह नि…
  12. Verse 14अब (कर्थं स्वभावो भावानाम्‌" इस प्रश्न का समाधान करते हैं। कल्पनाम के ब्रह्म के निमेष तक…
  13. Verse 15जैसे संवित्‌ अंशभूत जीव का सर्वानुगतचित्स्वरूप ही स्वभाव है वैसे ही अपने स्वरूप का त्याग…
  14. Verses 16–18भद्र, संविन्मय विभिन्न वृत्तियों में भी जो चिदाभास संविदों का स्फुरण होता है वही उनका स्व…
  15. Verse 19विविध आकारो को दर्शाकर उनका पारमार्थिक स्वभाव अधिष्ठानभूत चिदाकाश ही है, यह दशति हैं । उक…
  16. Verse 20इस प्रकार संवित्‌ के आगार होने के कारण वे पंचमहाभूत ब्राह्मी संवित्रूप से ही उदित हैँ इस…
  17. Verse 21चिति ही संवित्‌ कही गई हे । सब कुछ की प्रकाशक होने के कारण सर्वज्ञ सर्वरूप सर्वगामिनी वह…
  18. Verse 22यह चतुर्मुखनामधारी ब्रह्म-बालक स्वात्मभूत संवित्‌ के स्फुरण आकाशरूप आवरणवाली इस पृथिवी का…
  19. Verse 23जव वह मायाशबल सर्वज्ञसंवित्‌ ब्रह्मा की संवित्‌ के साथ स्थूल और सूक्ष्म प्रपंच का अपने मे…
  20. Verse 24'दीर्घत्वमथ हस्वत्वं दिवसानां तु किकृतम्‌* इस प्रश्न का उत्तर तो ज्योतिश्वक्र मे सूर्यकि…
  21. Verse 25"सत्स्वनेकेषु देवेषु सूर्य एवोग्रभाः कथम्‌" इस प्रश्न मे जो अनेक देवता कहे गये हैं, उनको…
  22. Verses 26–28वास्तव में तो ये सकल पदार्थ न उत्पन्न ही हुए हैं और न दिखाई ही देते हैं | ज्ञानी पुरुष को…
  23. Verse 29वह पारमार्थिक सद्रूप ही अध्यस्त में जितने समय तक घट आदि की विद्यमानता रहती है तब तक तद्रू…
  24. Verse 30वह ब्रह्मसत्ता आकाशरूप प्रथम उत्पन्न अपने अंग के अन्दर शब्दतन्मात्ररूप स्थिति से कुसूल के…
  25. Verses 31–34उससे यह वायु, तेज, जल, पृथिवीरूप भूत-भोतिक जगत्‌ क्रम से उत्पन्न होता है इस तरह कि जो यहा…
  26. Verses 35–38अभिन्न सत्तावाला होने पर ब्रह्म के अन्दर जगत्‌ अवयववत्‌ उदय और अस्तरहित ही है, यह सिद्ध ह…
  27. Verse 39उसके बाद जो होता है, उसे कहते है । घनसंवेदन के बाद जीव नामवाली वह आत्मकल्पना जीवादि रूपों…
  28. Verse 40यदि कोई कहे कि वह सदा ही परम पदरूप ब्रह्म है, उसका अधिकारी देह में ज्ञानप्राप्ति से कोन उ…
  29. Verses 41–42उस समय जब कि उसकी अविद्या से आवृत अवस्था रहती है, वह एकमात्र आत्मतादात्म्यअध्यास की भावना…
  30. Verses 43–46उससे अहंकार प्रधान लिगदेह-कल्पना होती है, यह कहते हैं। उसके बाद लिंगदेहवर्ती प्राणक्रिया…
  31. Verses 47–48उसकी जीवसमष्टि हिरण्यगर्भकूप से स्थूल पंचभूतकल्पना को कहते है। इस प्रकार भावनावाली चिति स…
  32. Verse 49उस वेदरूप शब्दसार से शब्दराशि से निर्मित अर्थो की राशि के परिणाम से विस्तारवाली सम्पूर्ण…
  33. Verses 50–51इस प्रकार के विचित्र संकल्पवाली ब्रह्म चिति ही जीव शब्द से कही जाती है, उससे अन्य नहीं है…
  34. Verses 52–53उसके स्वनिर्मित भूतभौतिक प्रपंच के भोग के लिए समष्टि त्वचा आदि इन्द्रियो की कल्पना का प्र…
  35. Verse 54उसी तरह पवन स्कन्धभूत उस हिरण्यगर्भ चिति मेँ चिद्विलास के प्रकाश से जो अनुभव होता है वह र…
  36. Verse 55प्रकाशानुभव की ही रूपतन्मात्रता का उपपादन करते है । प्रकाश चेतन ही तेज हे । तेज अन्यकृत न…
  37. Verse 56शब्दसंवेदनरूप शब्द स्वतः ही अनुभूत होता है। जैसे आकाश आकाश से ही आकाशरूप कोश में अवकाश पा…
  38. Verse 57सृष्टि के आदि में समष्टि की तरह इस समय व्यष्टि में भी तत्‌ तत्‌ की संवित्‌ ही अपने में तत…
  39. Verse 58शब्द में प्रदर्शित न्याय रस आदि में भी समझना चाहिये, ऐसा कहते है । इस प्रकार रसतन्मात्र ओ…
  40. Verse 59तेज सूर्य आदि के विकासो से प्रकाशरूपी महावृक्ष का बीजभूत है, उसमें रूपभेद द्वारा संसार की…
  41. Verses 60–66विकारशून्य आकाश से जैसा आगे होनेवाले उस पंचीकृत अन्नपान आदि का स्वतः माधुर्य-स्वादन होता…
  42. Verses 67–68पूर्वोक्त द्विविध परिच्छेद की तरह देह पिण्ड में अहंभावग्रयुक्त इसकी दिक्काल के भेद की कल्…