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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

कलनस्यास्य नामानि बहूनि रघुनन्दन । श्रृणु तानि विचित्राणि चेत्योन्मुखचिदात्मनः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

आदि सृष्टि में जो जो काकतालीयन्याय से विधाता को जैसा-जैसा प्रतीत हुआ वह वैसा ही अर्थक्रियादि द्वारा नियतरूप से स्थित है, विधाता की इच्छा ही उसके अव्यभिचार में हेतु है यही बात वस्तुओं के स्वभाव के विषय में भी जाननी चाहिए, इस आशय से प्रथम दो प्रश्नो का श्री वसिष्ठजी उत्तर देते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामजी, आदि सृष्टि में उस निश्चल परम ब्रह्म में स्वभाव से ही काकतालीयवत्‌ नियत जो भान हुआ वह जैसा था और जिस प्रकार के कार्यकारणभाव से स्थित था वैसा ही आज भी स्थित वह जगत्‌ शब्द से कहलाता है