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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 60–66

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verses 60–66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 60-66

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

विकारशून्य आकाश से जैसा आगे होनेवाले उस पंचीकृत अन्नपान आदि का स्वतः माधुर्य-स्वादन होता है वह रसतन्मात्रा कहलाता है । उसके पश्चात्‌ जिसका रूप, संकल्प नाम आगे होनेवाला है ऐसा यह कार्यकारण समुदायरूप जीव संकल्पभूत गन्धादि तन्मात्र की कल्पना करता हे । भावी भूगोल के रूप से आधाररूपी महावृक्ष का बीजभूत सकल के आधाररूप उस गन्धतन्मात्र से संसार का प्रसार होगा । वास्तव में अनुत्पन्न ही शब्दस्पर्शरूप आदि तन्मात्राओं का समूह इस प्रकार उत्पन्न हुआ वास्तव मेँ निराकार भी वह कल्पनावश साकार हो गया । यह तन्मात्राओं का समूह काकतालीय के समान जिस प्रदेश से स्वयंरूप को जानता है वह नेत्र कहलाता है, जिस प्रदेश से स्पर्श का अनुभव करता है वह त्वगिन्द्रिय कहलाता है, जिस प्रदेश से रस का स्वाद लेता है वह रसनेन्द्रिय कहलाता है एवं जिस प्रदेश से गन्ध का अनुभव करता है वह प्राणेन्द्रिय कहलाता हे