Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
प्रौढसंकल्पजालात्स पुर्यष्टकमिति स्मृतम् ।
संसृतेः प्रकृतत्वेन प्राथम्यात्प्रकृतिः स्मृता ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा चकि जाग्रत्. स्वप्न ओर सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओ का अज्ञात आत्मा ही स्वभाव है,
इसलिए यथादृष्टि नियति का व्यभिचार नहीं होता है, ऐसा कहते है ।
चित् में जाग्रत्, स्वप्न ओर सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं का जो स्वतः स्फुरण है अत्यन्त निर्मल
वह उससे वैसे ही अभिन्न है जैसे कि जल से द्रवत्व अभिन्न हे