Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 40
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि वह सदा ही परम पदरूप ब्रह्म है, उसका अधिकारी देह में ज्ञानप्राप्ति से कोन
उत्कर्ष ? इस पर कहते है।
चूँकि वह परम सत्ता जीवत्वदशा में चिदाकाश का आवरण करनेवाली अविद्या को धारण करके
स्थित है अतएव उसका परमपद स्वभाव प्रकट नहीं रहता । इस समय ज्ञान प्राप्ति होने पर अतिविशुद्ध
वह परमपद की (ब्रह्म की) अभिन्नरूपिणी (प्राप्त-अभेदवाली) हो जाती है