Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 31–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verses 31–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 31,32
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उससे यह वायु, तेज, जल, पृथिवीरूप भूत-भोतिक
जगत् क्रम से उत्पन्न होता है इस तरह कि जो यहाँ कल्पना है वह अज्ञानी लोगों के तत्त्वबोध के
लिए जगत् सृष्टि-प्रतिपादन की इच्छा से श्रुतियों और मुनियों द्वारा की गई है न कि सृष्टि ही
तात्त्विकी (वास्तवी) है, यह प्रतिपादन के लिए की गई है । यदि सृष्टि ही वास्तविक है यह प्रतिपादन
के लिए हो तो यह सृष्टिकथा मूर्खो द्वारा ही विरचित और व्यर्थ होगी, क्योकि यह सृष्टि वास्तविक
है यह ज्ञान होने पर किसी का न तो कोई प्रयोजन शास्त्रों में सुना गया है और न लोक में कहीं देखा
गया है। वह यहाँ कभी न तो अस्त को प्राप्त होता है और न उदित होता है। शिला गर्भ के समान
नित्य शान्त यह सत् भी असत्, है, क्योंकि तात्त्विक ब्रह्मरूप न अस्त को प्राप्त होता है और न
उदित होता हे । इस कारण पर सत्ता से सत् भी यह प्रपंचरूप स्वत: असत् है