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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 30

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

वह ब्रह्मसत्ता आकाशरूप प्रथम उत्पन्न अपने अंग के अन्दर शब्दतन्मात्ररूप स्थिति से कुसूल के (कोठिला के) भीतर रक्खे हुए बीजों में आविर्भूत न हुई अंकुरशक्ति के तुल्य वायु आदि जगत्‌ की बीजभूत शक्ति के रूप से अनाविर्भूत होकर रहती है