Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । आदिमत्त्वमिदं प्रोक्तमेतस्य कलनस्य यत् । परस्मादद्वितीयं तत्त्वद्बोधाय न वास्तवम् ॥ १ ॥ एवंविधं तत्कलनमात्मनोऽङ्गमकृत्रिमम् । चेत्योन्मुखचिदाभासं जीवशब्देन कथ्यते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, विचित्र असंख्य पदार्थों का कार्यकारण भावादि नियमरूप नियति तथा अग्निजिलादि का उष्णता, द्रवत्व आदिरूप स्वभाव इस संसार में किस हेतु से एकरूप ओर अचल होकर स्थित हैं ? क्योकि स्वप्न, मनोरथ आदि अन्य मिथ्या पदार्थो में तो यह स्थिर नहीं दिखाई देता । असंख्य देवताओं में सूर्य की ही इतनी उग्र प्रभा कैसे हुई और दिवसों की दीर्घता (लम्बा होना) ओर हस्वता (छोटा होना) किसने की ?

सर्ग सन्दर्भ

एस सौ छियासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सत्तासीवाँ सर्गं सम्पूर्ण पदार्थो का स्वभाव, नियति (कार्यकारणभाव आदि का नियम) तथा जीवत्व की प्राप्ति के हेतुओं की उत्पत्ति ओर ब्रह्मशुद्धता का वर्णन ।