Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
इत्यातिवाहिकः प्रोक्तो देहो देहभृतां वर ।
चिन्नभश्चित्तदेहोऽसौ शून्य आकाशतोपि च ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव काल, किया, देश, द्रव्य आदि वस्तुभेद रूप से चित् स्फुरण ही सकल वस्तु का स्वभाव
और नियति है, यह कहते हैँ ।
जो स्वप्न के समान अपने स्वभाव से चित् का स्फुरण है वह काल है, वह क्रिया है, वह आकाश है,
वह देश, द्रव्यादि का आविर्भाव है