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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 43–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verses 43–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 43-46

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

उससे अहंकार प्रधान लिगदेह-कल्पना होती है, यह कहते हैं। उसके बाद लिंगदेहवर्ती प्राणक्रिया से होनेवाली कालसत्ता के साथ अहन्ता का उदय होता हे । होनेवाले व्यवहार के प्रयोजनभूत वे दोनों (कालसत्ता ओर अहन्ता) जगत्‌ की स्थिति के बीजभूत हैँ । परम चितिशक्ति का स्वस्फुरण असद्रूप यह जगज्जाल उसके चेतन से सत्‌ के समान स्थित हे । इस तरह की संकल्परूपी महावृक्ष की बीजभूत वह चिति अपने अन्दर अहन्ता की भावना करती हे ओर क्षणभर में अहन्तास्वरूप हो जाती हे । वही यह आज हिरण्यगर्भरूप से समष्टि-जीव नाम को प्राप्तकर उत्पत्ति, नाशरूप भ्रान्तियों से मायाशबल ब्रह्म में वैसे ही भ्रमण करती है जैसे जल में जल लहरियों से भ्रमण करता हे