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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

काकतालीयवद्भाताः पञ्च स्वेन्द्रियसंविदः । यत्र यत्र यथा तेषां स्थितास्तत्र तथा स्थिताः ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

विविध आकारो को दर्शाकर उनका पारमार्थिक स्वभाव अधिष्ठानभूत चिदाकाश ही है, यह दशति हैं । उक्त पृथिवी आदि प्रत्येक अपने अपने कार्यो के आगार (भंडार) हैँ । यथा पार्थिव सब वस्तुओं का पृथिवी अनुगत स्वभाव है, जलीय सकल वस्तुओं का जल अनुगत स्वभाव हे, तेजस सकल वस्तुओं का तेज अनुगत स्वभाव है, स्पन्द आदि वायवीय सकल वस्तुओं का वायु अनुगत स्वभाव है ओर शून्यत्वादि आकाशीय सकल पदार्थो का आकाश अनुगत स्वभाव हे । उन सबका स्वप्न की तरह मायाशबल ब्रह्म ही आगार (भंडार) है । हे राजन्‌, उनमें इस कठिन समूर्तं भाग का महान्‌ आगार (भंडार) भूमि हे वह जनता का आधार ओर राजा की तरह पालक है ॥१७.१८॥ गंगा आदि प्रधानभूत जलो का सकल स्व स्व विशेषो मेँ अनुगत सागर महान्‌ आगार तथा राजा की तरह जीवनप्रद है, अग्नि आदि तेजो का स्व स्व विशेषो मेँ अनुगत यह सूर्य महान्‌ भंडार तथा राजा की तरह जीवनप्रद है, स्पन्द का स्व स्व विशेषों मे अनुगत पवन महान्‌ भंडार तथा जीवनप्रद है तथा शून्यता का स्व स्व विशेषो में अनुगत आकाश महान्‌ भंडार है