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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verses 35–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verses 35–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 35-38

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अभिन्न सत्तावाला होने पर ब्रह्म के अन्दर जगत्‌ अवयववत्‌ उदय और अस्तरहित ही है, यह सिद्ध होता है, यह कहते हैं। जैसे अवयवी के अन्दर अवयव अणु सदा ही न तो अस्त को प्राप्त होते हैं और न उदित होते हैं वैसे ही परमात्मपद में अनन्त जगत्‌ भी न तो अस्त को प्राप्त होते हैं और न उदित होते हैं ॥३ ३॥ ब्रह्म सत्ता से अतिरिक्त जगत्‌ सत्ता का अपलाप करने पर जगत्‌ शुद्ध ब्रह्मस्वरूप ही सिद्ध होता है, इसलिए इसके उदय, अस्तमय आदि वैचित्र्य का विनाश हुआ, यह कहते हैं। जैसे आकाश आकाश में रहता है वैसे ही ब्रह्माकाश में जगताकाश रहता है, यों अत्यन्त विशुद्ध जगत्‌ का कैसे विनाश होता है, कैसे उदय होता है ? ॥३ ४॥ इस तरह जगत्‌ के मूल तत्त्व का विचार करने पर जगत्‌ की ब्रह्ममात्रता का प्रतिपादनकर ब्रह्म ही स्वतात्तिक (वास्तविक) रूप का विस्मरण होने पर जगद्रूप होता है, यह कहने के लिए भूमिका रचते हैं । अनन्त प्रकाशरूप उस निस्सीम चिन्मणि का निरन्तर स्वभावतः जो सत्तामात्ररूप आत्मस्फुरण है, अज्ञात अतएव प्रथम अन्यथाभाव होने के कारण उसके अविमर्श का सूचक यानी अतर्कित वह उस रूप से स्वयं कुछ चेत्यता को जैसा प्राप्त होता है । तदनन्तर भावी नाम ओर अर्थो की कल्पनाओं द्वारा कुछ तर्कित रूपवाला आकाश से भी अणु और शुद्ध वह भावी प्रपंच के पर्यालोचन से उसका सबमें बोध करनेवाला होता है । तदुपरान्त उस किंचित चेत्यता से वह परम सत्ता पर्यालोचित पदार्थं को भलीभाँति चेतन बनाने में तत्पर होकर “चित्‌” (चेत्यतीत चित्‌ इस व्युत्पत्ति के अवसर की प्राप्ति से) नाम के योग्य होती हे