Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
एवमत्यन्तवितते संपन्ने दृश्यविभ्रमे ।
न किंचिदपि संपन्नं सर्वशून्यं ततं यतः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार संवित् के आगार
होने के कारण वे पंचमहाभूत ब्राह्मी संवित्रूप से ही उदित हैँ इस प्रकार ब्रह्म ही उनके अनुगत
होकर उनका स्वभाव है । इससे “सत्स्वसंख्येषु देवेषु सूर्य एवोग्रभाः कथम्” इस प्रश्न का भी समाधान
हो गया । स्वभाव -प्रश्न के उत्तर से ही उसका भी समाधान हो गया,अतः सूर्य के प्रति पृथक् प्रश्न
नहीं उठता है, यह अर्थ है