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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

भवत्यर्थकरोऽत्युच्चैस्तच्चित्खस्वप्नवस्तुवत् । आकाशात्मक एवोग्रः पदार्थ इव भासते ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

'दीर्घत्वमथ हस्वत्वं दिवसानां तु किकृतम्‌* इस प्रश्न का उत्तर तो ज्योतिश्वक्र मे सूर्यकि दक्षिणायण और उत्तरायण गति के भेद की प्रसिद्धि से ही हो गया, यों सूचित करते हुए ज्योतिश्वक्र को दशाति हैं। मकड़ी द्वारा संकल्पपूर्वक बाह्य साधनों के बिना ही विरचित मक्खियों को बोधने के जाल की तरह ब्रह्मा से केवल विविध संकल्पो द्वारा निर्मित ग्रह, नक्षत्र आदि का गृहभूत शिशुमारचक्र ज्योतिषशास्त्र आदि में प्रसिद्ध ही है । सूर्य द्वारा उसी के दक्षिणायण ओर उत्तरायण मार्गो का अवलम्बन करने के कारण आपसे पूछा गया दिवसों का हस्वत्व ओर दीर्घत्व जैसे यह चिदाकाश दृश्य के समान प्रतीत होता है वैसे ही प्रतीत होता है