Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 188, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 188 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
आतिवाहिकदेहोऽसौ स्वतोऽनुभवति क्रमात् ।
अनाकारोपि शून्योपि स्वप्नाभोऽसन्नपि स्थितः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
"सत्स्वनेकेषु देवेषु सूर्य एवोग्रभाः कथम्" इस प्रश्न मे जो अनेक देवता कहे गये हैं, उनको ज्योतिश्चक्र
में नक्षत्ररूप से स्थित दिखलाते हे ।
उनमें कोई (सूर्य आदि) अत्यन्त भास्वर हैं, कोई (चन्द्र आदि) अल्प भास्वर ओर कोई (पूर्वोक्त
राहु आदि तामस नक्षत्र) अभास्वर हैं | सब पदार्थ विविध रूप से भासित होते हैं