Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 173
एक सौ इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बहत्तरवाँ सर्ग॑ विधाता केवल मनरूप है, उसका संकल्प जगद्भ्रान्ति हैँ ।
31 verse-groups
- Verse 1उसका न शरीर है और न उसे स्मृति हो सकती है, यह कथनपूर्वक स्मृतितत्त्व का वर्णन । यदि कोई क…
- Verse 2कैसे उसकी चिन्मात्रता की प्रसिद्धि है 2 इस पर कहते है । मननाकार की कल्पना के पूर्व वह चिन…
- Verse 3इसलिए उसके बुद्धि आदि भी चित् से पथक् नहीं हैं, यह कहते हैं । केवल सत्तामात्रस्वरूप प्र…
- Verse 4इसी प्रकार उसके देह आदि भी नहीं हैं, ऐसा कहते हैं। उसके न देह, चित्त आदि हैं, न इन्द्र्यो…
- Verse 5क्यो नहीं हैं ? यह यदि पूछो तो आदि सृष्टि के आरंभ में कारण ही कोई नहीं है, इसलिए नही है ।…
- Verse 6संसार में स्थित तथा आवागमन के चक्कर में पड़े हुए जीवों की तरह विदेहमुक्त पुरुषों के संसार…
- Verse 7अथवा यदि प्रजापति की पूर्वकल्प में की गई प्रबल उपासना से उत्पन्न हिरण्यगर्भ में अहंभाव वि…
- Verse 8यदि कोई शंका करे कि पृथिवी आदि से रचा हुआ दिखाई दे रहा ब्रह्माण्डरूप विराट् शरीर पृथिवी…
- Verse 9यदि कोई कहे कि पहले उदाहरण के रूप में प्रदर्शित श्रुति में “दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो…
- Verse 10इस प्रजापति को पूर्वकल्प में, जब कि वह उपासक था, पृथ्वी आदि का अनुभव था ही। यदि उस समय उस…
- Verse 11ठीक है, हम कल्पनारूप भ्रान्ति से जन्य निरर्थक स्मृति का खंडन नहीं करते परन्तु सत्य पदार्थ…
- Verse 12स्मृति का क्यो संभव नहीं है ? इस प्रश्न पर कहते हैं। नेह नानास्ति किंचन" (यहाँ भेद कुछ भी…
- Verses 13–15परमार्थरूप से उत्पन्न होकर विद्यमानता को प्राप्त हुई वस्तु का प्रत्यक्षादि प्रमाणो से अनु…
- Verse 16पूर्वोक्त आशय को ही पुनः सूचित करते हुए समाधान का उपसंहार करते हैं। इसलिए प्रजापति की आद्…
- Verse 17अतीत पदार्थ का संस्कारवश अन्तःकरण में स्मरण लोक में स्मृति कही जाती है । प्रजापति का तो क…
- Verse 18इस प्रकार चूँकि यह दृश्य आदि, मध्य ओर अन्तशून्य कूटस्थ परम ब्रह्म ही हे, इसलिए स्मृति आदि…
- Verse 19चिदाकाश का स्फुरण सर्वात्मक होने से स्मृत्यात्मक भी है, ऐसा यदि कहो तो ठीक हे । इसी अभिप्…
- Verse 20अज्ञात ब्रह्म के स्वभाव का परोक्षरूप से ही जो स्फुरण है वही यह स्मरण हे । तदनन्तर मेँ ब्र…
- Verse 21जीव द्वारा अज्ञानउपहित ब्रह्म जिस जिस स्वरूप से ज्ञात होता है भ्रान्ति से अथवा स्मृतिपरम्…
- Verse 22जैसे भ्रमयुक्त अनुभव में (भ्रमज्ञान में) विद्यमान भी दृश्य (रज्जुसर्प, शुक्तिरजत आदि) भास…
- Verses 23–26सत्य सवात्मि में स्थित जो संवित् स्फुरित होती हैं वे ही भ्रान्त अभ्यास की दढता से बद्धमू…
- Verses 27–33यदि संवित् सवत्सा की अगभूत हैँ तो वे उसके समान ही सदेव क्यो स्फुरित नहीं होतीं 2 इस प्रश…
- Verse 34अव स्मृति के कारणभूत संस्कार का खण्डन करने के लिए संस्कार का स्वरूप बतलाते हैं। अन्तःकरणउ…
- Verses 35–36चिन्मात्र मे परिकल्प्यमान तथा तत्त्वज्ञान से आत्मस्वभावभूत हुए सब बाह्य अर्थो का बाधितानु…
- Verses 37–40ऐसी स्थिति में फलितार्थ कहते हैं। इस प्रकार कदापि किंचित् भी जगत् का संभव है ही नहीं जग…
- Verse 41इसकी आकारवत्ता का खण्डन कीजिये पर स्मृतिरूपता का क्यो खण्डन करते हैं ? वादी के इस कथन पर…
- Verses 42–43भूताकाश के समान व्यापक शून्य चिदाकाश में भुवन, सूर्य,पर्वत आदि रूप यह सारा दृश्य अपने स्व…
- Verse 44एकमात्र स्वानुभवरूप स्वरूपवाला प्रमाता का स्वप्न अपृथिवीवाला है । भला बतलाइये तो सही वहाँ…
- Verse 45इसलिए वैसे ही केवल शान्त चिदाकाशका ही अपने स्वरूप में भान होता है । सृष्टि के आदि में ओर…
- Verse 46जगद्रूप ब्रह्मसत्ता अपने से अपने में मानों उत्पन्न सी होकर पीछे सत्य अर्थ देनेवाली- सी पृ…
- Verses 47–48जगद्रूप दृश्य न स्मृतिरूप है ओर न साकार ही है, क्योकि पृथिवी आदि का अत्यन्त असंभव है । इस…