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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

चेतनाचेतनात्मैकं पुरुषस्य यथा वपुः । नखकेशजलाकाशधर्ममाकारभासुरम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रजापति को पूर्वकल्प में, जब कि वह उपासक था, पृथ्वी आदि का अनुभव था ही। यदि उस समय उसे पृथिवी आदि का अनुभव न होता तो रँ पृथिवी आदि से रचित विराट शरीरवाला हूँ” ऐसी उपासना कैसे करता ? उसके अनन्तर यह उक्त अनुभव के बल से निर्माण सामर्थ्य प्राप्त कर उसकी स्मृति से सृष्टि का निर्माण करेगा । स्मृति के बिना ही उसका निर्माण करने पर तो “धाता यथापूर्वमकल्पयत्‌“ इस श्रुतिवचन द्वारा बोधित पूर्वकल्प के ब्रह्माण्ड की सारी गुणराशि की इस ब्रह्माण्ड में कैसे सिद्धि होगी, ऐसी श्रीरामचन्द्रजी शंका करते है । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे स्मृतिमानों में सर्वश्रेष्ठ गुरुवर, हे गुणराशि के भंडार, इनकी स्मृति क्यों नहीं होती और स्मृति के अभाव में पूर्वकल्प के गुण इस कल्प के ब्रह्माण्ड में कैसे आये ?